किसी व्यक्ति के कार्य का मूल्यांकन करना है, या उस व्यक्ति ने किये हुए कार्य का यश – अपयश देखना है, तो उस व्यक्ति के पश्चात, उसके कार्य की स्थिति क्या है, यह देखना उचित रहता है. उदाहरण है – छत्रपति शिवाजी महाराज. मात्र पचास वर्ष का जीवन. लगभग तीस वर्ष उन्होंने राज- काज किया और हिंदवी साम्राज्य खड़ा किया. किंतु उनके मृत्यु के पश्चात उस हिंदवी स्वराज्य की परिस्थिति क्या थी? हिन्दुस्थान का शहंशाह औरंगजेब तीन लाख की चतुरंग सेना लेकर महाराष्ट्र में आया था, इसी हिंदवी स्वराज्य को मसलने के लिए, सदा के लिए समाप्त करने के लिए.
परिणाम?
सारी जोड़-तोड़ करने के बाद, वह संभाजी महाराज से मात्र २ – ४ दुर्ग (किले) ही जीत सका. आखिरकार छल कपट करके, ११ मार्च १६८९ को औरंगजेब ने संभाजी महाराज को तड़पा – तड़पा कर, अत्यंत क्रूरता के साथ समाप्त किया. उसे लगा, अब तो हिन्दुओं का राज्य, यूं मसल दूंगा. लेकिन मराठों ने, शिवाजी महाराज के दूसरे पुत्र – राजाराम महाराज के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा. आखिर ३ मार्च १७०० को राजाराम महाराज भी चल बसे. औरंगजेब ने सोचा, ‘चलो, अब तो कोई नेता भी नहीं बचा इन मराठों का. अब तो जीत अपनी है.’
किन्तु शिवाजी महाराज की प्रेरणा से सामान्य व्यक्ति, मावले, किसान… सभी सैनिक बन गए. मानो महाराष्ट्र में घास की पत्तियां भी भाले और बर्छी बन गई. आलमगीर औरंगजेब इस हिंदवी स्वराज्य को जीत न सका. पूरे २६ वर्ष वह महाराष्ट्र में, भारी भरकम सेना लेकर मराठों से लड़ता रहा. इन छब्बीस वर्षों में उसने आगरा / दिल्ली का मुंह तक नहीं देखा. आखिरकार ८९ वर्ष की आयु में, ३ मार्च १७०७ को, उसकी महाराष्ट्र में, अहमदनगर के पास मौत हुई, और उसे औरंगाबाद के पास दफनाया गया. जो औरंगजेब हिंदवी स्वराज्य को मिटाने निकला था, उसकी कब्र उसी महाराष्ट्र में खुदी. मुगल वंश मानो समाप्त हुआ. मराठों का दबदबा दिल्ली पर चलने लगा. बाद में तो हिन्दुओं का भगवा ध्वज लाल किले की प्राचीर पर फहरने लगा. मात्र दो तीन जिलों तक फैला हुआ हिंदवी स्वराज्य छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु के पश्चात सारे भारत वर्ष में फैल गया. अटक के भी उस पार तक गया.
इसी दृष्टिकोण से डॉक्टर केशव बळीराम हेडगेवार जी के कार्य को देखना चाहिए. 1889 से 1940, यह मात्र 51 वर्षों का जीवन प्रवास है. इस प्रवास के अंतिम 15 वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के पश्चात के हैं. जिन दिनों लोग हिन्दू हितों की रक्षा के लिए बोलने में भी घबराते थे, हिन्दू कहलाने से सकुचाते थे, उन्हीं दिनों डॉक्टर हेडगेवार जी अत्यंत आत्मविश्वास से बोल रहे थे, “हां, मैं कहता हूं, यह हिन्दू राष्ट्र है.”
आज डॉक्टर हेडगेवार जी के कार्य का स्वरूप क्या है?
डॉक्टर जी द्वारा सन् 1925 में शुरू किया हुआ संघ आज भारत के कोने – कोने में पहुंचा है. इसी के साथ विश्व के उन सभी देशों में, जहां हिन्दू कम संख्या में भी क्यों ना हों, रहते हैं, उन सभी देशों में संघ के स्वयंसेवक हैं. और यह सज्जन शक्ति डॉक्टर हेडगेवार जी को अपेक्षित ऐसे हिन्दू संस्कृति के मूलाधार राष्ट्र को वैभवशाली, समृद्ध और संपन्न बनाने में जुटी है.
यह डॉक्टर हेडगेवार जी का निर्विवाद यश है.
डॉक्टर हेडगेवार जी ने अपने जीवन का उत्तरार्ध हिन्दू संगठन के लिए दिया. बाल्यकाल से ही डॉक्टर हेडगेवार प्रखर देशभक्त थे, साथ ही प्रत्यक्ष कार्य करने वाले कृतिशील कार्यकर्ता थे. उनके मन में जो अंगार जल रही थी, वह परतंत्रता को लेकर थी. इसीलिए विशाल भारत वर्ष पर राज करने वाली अंग्रेजी सत्ता को उखाड़कर फेंकना यह उनके जीवन का ध्येय (लक्ष्य) बना था. इसी ध्येय का अनुसरण करते हुए उन्होंने अपनी महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए कलकत्ता (वर्तमान में कोलकाता) शहर चुना. वे बंगभंग आंदोलन के दिन थे. कलकत्ता क्रांतिकारियों का केंद्र बना था. हेडगेवार जी छह वर्ष कलकत्ता में रहे. क्रांतिकारियों की ‘अनुशीलन समिति’ के सदस्य बने. ‘कोकेन’ नाम से क्रांतिकारियों में जाने जाते थे. इस क्रांतिकारी आंदोलन को उन्होंने अत्यंत निकट से देखा.
किंतु ‘इस रास्ते से स्वराज्य मिलेगा क्या?’ यह एक प्रश्न तथा साथ ही दूसरा महत्त्व का प्रश्न ‘स्वतंत्रता मिलने के बाद हमारे देश की रचना कैसी होनी चाहिये?’ यह भी उनको सताये जा रहा था. हमारा देश जिन कारणों से गुलाम हुआ, उन कारणों को दूर करते हुए नया स्वतंत्र भारत कैसा होना चाहिये, इस पर वह सतत चिंतन करते थे. किंतु उनके प्रश्नों के उत्तर उनको नहीं मिल रहे थे. उन्होंने कांग्रेस में रहकर काम किया. पहले सदस्य बने, फिर पदाधिकारी. अत्यंत सक्रियता से उन्होंने काँग्रेस के आंदोलनों मे हिस्सा लिया. दो बार जेल गए. किंतु उनको समझ में आया कि काँग्रेस में, या अन्य सभी प्रवाहों में, इस देश का मूलाधार हिन्दू उपेक्षित हो रहा है. मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर हिन्दुओं पर जबरदस्त दबाव बनाया जा रहा है. इसका दोषी भी हिन्दू समाज ही है. हिन्दू अपने तेजस्वी इतिहास को, शौर्य को, साहस को तेज को, गौरवशाली परंपराओं को भूलते जा रहे हैं.
स्वतंत्रता मिलने पर स्वतंत्र भारत में हिन्दुओं की स्थिति, अर्थात देश की स्थिति कैसी रहेगी, इसका भीषण और भयानक चित्र उनको सामने दिख रहा था. इसलिये वर्ष 1916 में मेडिकल की परीक्षा उत्तीर्ण करके वे नागपुर आये. अविवाहित रहकर संपूर्ण जीवन राष्ट्र कार्य के लिए लगाने का उनका प्रण था. अगले नौ वर्ष, वे स्वतंत्रता प्राप्ति के विविध प्रवाहों में शामिल होकर अपने प्रश्न का उत्तर खोज रहे थे. 1923 और 1924 मे नागपुर में मुस्लिम आक्रामकता बढ़ रही थी. डॉक्टर हेडगेवार काँग्रेस के पदाधिकारी थे. अपने प्रश्न का उत्तर ढूंढने, वे फरवरी 1924 में वर्धा में महात्मा गांधी जी से मिले. किंतु हिन्दू – मुस्लिम समस्या के बारे में उन्हें तर्कपूर्ण या समाधानकारक उत्तर नहीं मिले.
इन सभी प्रक्रियाओं से निकलते हुए, अपने सहकारी कार्यकर्ताओं से, नेताओं से विचार विनिमय करते हुए, डॉक्टर जी के मन मस्तिष्क में हिन्दू संगठन की रूपरेखा तैयार हो रही थी. किसी का भी द्वेष न करते हुए, एक ऐसा हिन्दू संगठन खड़ा करना, जिससे अनुशासन रहेगा, सैनिकी पद्धति का कामकाज रहेगा, और वैचारिक स्पष्टता होगी. इसी को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन, अर्थात रविवार, 27 सितंबर को नागपुर में डॉक्टर हेडगेवार जी के घर पर संघ प्रारंभ हुआ. यह संगठन मुस्लिम आक्रामकता के प्रतिक्रिया के स्वरूप बना था क्या? इसका स्पष्ट उत्तर है – नहीं. 28 मार्च, 1937 में अकोला के इस्टर कॅम्प में स्वयंसेवकों के सामने बोलते हुए डॉक्टर जी ने कहा था, “हिन्दुस्तान की रक्षा के लिए एखादा स्वयंसेवक संघ बना होता, जिसमें मुसलमान, क्रिश्चियन, अंग्रेज अथवा अन्य देशीय, अन्य धर्मीय लोग रहते या नहीं रहते, तो भी अपने हिन्दू समाज को ऐसे संघ का निर्माण करना क्रमप्राप्त (आवश्यक) था.”
डॉक्टर साहब की सोच बहुत दूर की थी. यह राष्ट्र संपन्न होना चाहिये, समृद्ध होना चाहिये, शक्तिशाली बनना चाहिये और इसलिये इस देश की जो मूल अस्मिता है, पहचान है, जो हिन्दू आचार, विचार और परंपरांओं पर आधारित है, वह सशक्त और बलशाली होना चाहिये. यह तभी संभव है, जब हमारा देश स्वतंत्र होगा. इसीलिए संघ का प्रारंभिक ध्येय इस देश को स्वतंत्र करने का था.
संघ प्रारंभ होने के ढाई वर्ष बाद, अर्थात वर्ष १९२८ के मार्च महीने में नागपुर – अमरावती रास्ते के ‘स्टार्की पॉईंट’ पर विशेष रूप से चुने हुए 99 स्वयंसेवकों को डॉक्टर जी ने स्वयं प्रतिज्ञा दी. इस प्रतिज्ञा में भी स्वतंत्रता का यही भाव प्रकट होता है. प्रतिज्ञा मूल मराठी में इस प्रकार है –
“मी सर्व शक्तिमान श्री परमेश्वराला व आपल्या पूर्वजांना स्मरून प्रतिज्ञा करतो की, मी आपला पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृती व हिन्दू समाज यांचे संरक्षणाकरिता व हिन्दू राष्ट्राला स्वतंत्र करण्याकरिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचा घटक झालो आहे. संघाचे कार्य मी प्रामाणिकपणे, नि:स्वार्थ बुद्धीने आणि तनमनधने करून करीन, व हे व्रत मी आजन्म पाळीन.”
“जय बजरंग बली हनुमान की जय!”
(मै सर्व शक्तिमान श्री परमेश्वर और मेरे पूर्वजों का स्मरण करते हुए प्रतिज्ञा लेता हूँ कि अपने पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति व हिन्दू समाज की रक्षा के लिए एवं हिन्दू राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं. संघ का कार्य मैं प्रामाणिकता से, निःस्वार्थ बुद्धि से व तन – मन – धन से करुंगा. इस व्रत का मैं आजन्म पालन करूंगा. जय बजरंग बली. हनुमान जी की जय.)
डॉक्टर जी ने जब संघ प्रारंभ किया, तब ‘हिन्दुत्व’ शब्द प्रचलन में नहीं था. स्वातंत्र्यवीर सावरकर जी ने 1927 से इस शब्द का प्रयोग करना प्रारंभ किया. इसके पहले स्वामी विवेकानंद जी ने हिन्दुत्व के लिए ‘हिन्दुइज्म’ शब्द का प्रयोग किया था. ‘इज्म’ यानि वाद अर्थात ‘हिन्दू वाद’. यह शब्द बाद में भी अनेकों बार प्रयोग किया गया. डॉक्टर जी ने ‘हिन्दुत्व’ के समानार्थी शब्द के रूप में ‘हिन्दू हुड’ (Hindu hood) शब्द का प्रयोग किया है.
मद्रास के डॉक्टर नायडू ने तामिळनाडू में हिन्दू महासभा कॉन्फरेन्स का आयोजन किया था. ‘इस कॉन्फरेन्स में डॉक्टर जी को उपस्थित रहना चाहिए’, ऐसा आग्रह करने वाला पत्र डॉक्टर नायडू ने डॉक्टर जी को लिखा. किंतु स्वास्थ्य ठीक न होने से डॉक्टर जी बिहार के राजगीर में गये थे. अर्थात उनका मद्रास जाना संभव नहीं था. इस संदर्भ में अपनी मृत्यू से तीन महीने पहले, अर्थात 1940 के 17 मार्च को, डॉक्टर जी ने मद्रास के डॉक्टर नायडू को पत्र लिखा. ‘हिन्दू समाज में हिन्दू जनजागरण के कार्य की आवश्यकता’ पत्र में डॉक्टर जी ने अधोरेखित की है. डॉक्टर जी लिखते हैं – “To arouse the dormant spirit of Hinduhood among our brethren of the South.” (“दक्षिण के बंधुओं में हिन्दुत्व की सुप्त भावनाओं को जगाने का यह कार्य है”)
19 अक्तूबर, 1929 को डॉक्टर जी ने नीलकंठ राव सदाफळ जी को एक पत्र भेजा है. इसमें डॉक्टर जी लिखते हैं, “स्वयंसेवकों के मन में राष्ट्रीयत्व का पूर्णतः संचार करके, हिन्दुत्व और राष्ट्रीयत्व में कोई भेद नहीं है, यह दोनों बाते एक ही हैं, यह तर्कपूर्ण ढंग से समझाना, यह संघ शाखाओं का काम है.”
डॉक्टर जी ने एक जगह लिखा है –
सामर्थ्य है हिन्दुत्व का.
प्रत्येक हिन्दू राष्ट्रीय का..
किंतु उसे संगठन का,
अधिष्ठान चाहिये..!
वे आगे लिखते हैं, “हिन्दुस्तान में आसेतु हिमाचल बसने वाले अखिल हिन्दुओं का एकरूप और मजबूत संगठन खड़ा करना यही हमारा वर्तमान धर्म है. हम लोगों में राष्ट्रीयत्व की भावना निर्माण करके, हिन्दू सब एक राष्ट् के अंग हैं तथा हिन्दू समाज के विभिन्न मत – पंथों के आचार – विचार एक ही प्रकार के हैं, यह वैज्ञानिक दृष्टी से समझाकर, प्रत्यक्ष कार्य करना है.”
डॉक्टर जी का हिन्दुत्व समझने के लिये अत्यंत सरल, सीधा और सुगम था. स्व. दादाराव परमार्थ उनके ‘परमपूजनीय डॉक्टर हेडगेवार’ लेख में लिखते हैं, “यह देश हिन्दुओं का है, यह तो हम सब का विश्वास था. हिन्दू बाहर से आये हैं, यह कल्पना हमें मान्य नहीं थी. मूलतः हिन्दू इसी देश के हैं तथा अपने त्याग, समर्पण और कर्तृत्व से यह राष्ट्र उन्होंने खड़ा किया है. इस देश का राष्ट्रीयत्व यह हिन्दुत्व है, इस पर डॉक्टर जी की अटूट श्रद्धा थी. इसलिये, इस देश पर पूर्ण समर्पित भाव से प्रेम करने वाला हिन्दू है. इस देश की प्रगति के लिये अपने आपको झोंककर काम करने वाला हिन्दू है. इस देश की सर्वांगीण उन्नति के लिए प्रयत्न की पराकाष्ठा करने वाला हिन्दू है. और ऐसे सारे हिन्दुओं का संगठन बांधना यह डॉक्टर जी का ध्येय था. इतने सीधे, सरल और स्वच्छ नजरों से देखने के कारण डॉक्टर जी को हिन्दू समाज के भेद-विभेद, जाति-पाती कभी दिखी ही नहीं. हिन्दुओं का संगठन करते समय यह विचार गलती से भी उनके मन में नहीं आया.”
और इसलिये जाति-पाती के चष्मे से जो लोग हिन्दू समाज को देखते थे, उनको बड़ा आश्चर्य लगता था. महात्मा गांधी जी को भी इसका आश्चर्य लगा था. वर्ष 1934 के दिसंबर में वर्धा में संघ का शीतकालीन शिविर लगा था. उन दिनों महात्मा गांधीजी का मुकाम वर्धा शहर में था. महात्मा जी के बंगले के पास ही यह शिविर स्थल था, इसलिए महात्मा जी को संघ के डेढ़ हजार स्वयंसेवकों के इस अनुशासित शिविर को देखने की इच्छा हुई. उनकी सुविधानुसार समय तय हुआ. 25 दिसंबर, 1934 मंगलवार को प्रातः छह बजे महात्मा जी शिविर में आएंगे, ऐसा निश्चित हुआ.
महात्मा जी तय समय पर शिविर में आए. वे वहां लगभग डेढ़ – दो घंटे रुके. उन्होंने शिविर की सारी जानकारी ली. सभी स्वयंसेवक एक साथ रहते हैं, एक ही पंक्ति में भोजन करते हैं, यह सुनकर और देखकर उन्हें आश्चर्य लगा. जो दिख रहा है, उसमें कितना तथ्य है यह जानने के लिए कुछ स्वयंसेवकों से प्रश्न भी पूछे. तब, “ये महार, ये ब्राह्मण, ये मराठा, ये दर्जी ऐसा भेदभाव हम नहीं मानते. हमारे बगल में किस जाति का स्वयंसेवक बैठा है, इसकी कोई जानकारी हमें नहीं रहती और ना ही वैसी जानकारी लेने की हम में से किसी की भी इच्छा रहती है. हम सब हिन्दू हैं और इसीलिए बंधु हैं. अतः आपसी व्यवहार में उंच-नीच सोच रखने की कल्पना भी हम नहीं करते.” इस प्रकार के उत्तर महात्माजी को स्वयंसेवकों से मिले.
यह है डॉक्टर हेडगेवार जी का हिन्दुत्व. बिलकुल सीधा और सरल. “हम सब हिन्दू हैं, इसलिये बंधु हैं” इस एक वाक्य ने हिन्दुओं का संगठन खड़ा किया, जो आज विश्व का सबसे बड़ा संगठन है.
डॉक्टर जी के संपूर्ण कार्यकाल में वह तात्विक या बौद्धिक विवादों में बहुत ज्यादा नहीं उलझे. उनका जोर, प्रत्यक्ष कार्य पर था. संघ प्रारंभ होने से पहले उन्होंने ऐसे सभी विचार प्रवाहों का विस्तृत अध्ययन किया था. हिन्दू समाज की कमियां, मुस्लिम आक्रांताओं के कारण हिन्दू समाज में आई कुरीतियां, कुछ प्राचीन, अप्रासंगिक परंपराएं… इन सबसे वे अच्छी तरह परिचित थे. किंतु इन सब बातों के विरोध में बोलते रहने की अपेक्षा प्रत्यक्ष कार्य कर, कृतिरूप उत्तर देने में उनका विश्वास था.
विभिन्न वैचारिक प्रवाहों में, संस्थाओं में, राजनैतिक दल में कार्य करने के कारण उनके विचारों में पारदर्शिता और स्पष्टता थी. ‘क्या करना है’ यह उनको अवगत था. इसलिये संघ स्थापना के बाद उनके 15 वर्षों के कालखंड में, और बाद में भी, संघ पर अनेक संकट आने के बावजूद संघ बढ़ता ही रहा. संघ के प्रारंभिक काल से इस बात की स्पष्टता थी, कि संघ का संगठन, हिन्दुओं के संरक्षण के लिए बना हुआ कोई रक्षक दल नहीं है. इसका अर्थ ऐसा कि हिन्दू समाज ने अपने संरक्षण के लिये संघ को, आज की भाषा में, ‘आऊटसोर्स’ किया हुआ नहीं है. संघ के स्वयंसेवक संकटों का सामना करेंगे, संघर्ष करेंगे और बाकी हिन्दू समाज इस संघर्ष का मजा देखता रहेगा, यह उन्हें अभिप्रेत नहीं था.
संघ का उद्देश्य यह हिन्दू समाज का संगठन कर संपूर्ण समाज को सक्षम बनाना यह था/ है. इसलिये ‘समाज ही सब कुछ करेगा’ यह भूमिका पहले से आज तक कायम है. यही संघ के यश का सूत्र भी रहा है. संघ ने सही अर्थों में हिन्दू समाज का सक्षमीकरण (empowerment) करना यह डॉक्टर हेडगेवार जी का अभिप्रेत था. इसलिये 1925 के बाद इस देश पर आये हुए सभी संकटों का सामना संघ ने पूरे समाज को साथ लेकर किया है. दो – तीन वर्ष पहले के कोरोना में भी संघ स्वयंसेवकों ने आगे बढ़कर अनेक काम किये. किंतु संघ ने कोरोना के इस संघर्ष में संपूर्ण समाज को साथ लेकर सक्रिय किया.
और यही डॉक्टर हेडगेवार जी की दूरदृष्टी सामने आती है. हिन्दू संगठन की रचना बनाते समय उन्होंने अत्यंत स्पष्ट और साफ शब्दों में कहा था, “हमें पूरे हिन्दू समाज का संगठन करना है, समाज में संगठन नहीं करना है”. यह अत्यंत महत्व का सूत्र है. डॉक्टर जी के पहले भी हिन्दू समाज में हिन्दू हितों के लिए काम करने वाली अनेक संस्थाएं और संगठन तैयार हुए थे. किंतु इन सबकी मर्यादाएं थी. समाज के एक प्रवाह जैसे यह संगठन / संस्थाएं थीं. किंतु प्रारंभ से ही डॉक्टर जी ने संघ को हिन्दू समाज का एक पंथ या प्रवाह न बनाते हुए, ‘संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन’ इसी स्वरूप में खड़ा किया. इसलिये पहले जो संघ के विरोधक थे, वही बाद में संघ के सक्रिय स्वयंसेवक बने.
हिन्दुओं का संगठन यह असंभव कल्पना है, ऐसा पहले बोला जाता था. किंतु डॉक्टर हेडगेवार जी ने इस बात को गलत सिद्ध करके बताया. संपूर्ण हिन्दू समाज का संगठन करने के लिये उन्होंने जो संघ की कार्यपद्धति बनायी, उसकी विश्व में कोई तुलना ही नहीं है. इसके कारण एकरूप, एकसमान सोच के, अपनी भारत माता को वैभव के परम शिखर पर पहुंचाने के ध्येय से प्रेरित, ऐसे करोड़ों हिन्दुओं का, विश्व का सबसे बड़ा संगठन खड़ा हुआ. यह संगठन, डॉक्टर जी की मृत्यु के पश्चात भी 83 वर्ष सतत वर्धिष्णु हो रहा है.
दूरदृष्टी के, भविष्य को देखने की क्षमता रखने वाले डॉक्टर हेडगेवार जी का यह निर्विवाद यश है..!
(‘विवेक प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दुत्व’ ग्रंथ में प्रकाशित आलेख के कुछ अंश)
I appreciate the time and effort you’ve put into compiling this content. Thanks for sharing it with us.
Your writing style is engaging, and the information is presented clearly. Thanks for this informative piece!