केशव बलिराम हेडगेवार ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक’ और प्रकाण्ड क्रान्तिकारी थे। वे विदर्भ प्रांतीय कांग्रेस के सचिव बने। असहयोग आंदोलन के दौरान मराठी मध्य प्रांत की तरफ से डॉ० हेडगेवार की अगुवाई में बनाई गई असहयोग आंदोलन समिति ने कार्यकर्ताओं को आंदोलन के प्रति जागृत करने का काम किया। इस पर आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजी हूकूमत ने डॉ हेडगेवार को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था। डॉ हेडगेवार ने 1925 में 17 लोगों के साथ ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की थी।

जन्म
केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 में महाराष्ट्र के नागपुर जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम बलिराम पंत हेडगेवार था और उनकी माता का नाम रेवतीबाई था। डॉक्टर हेडगेवार का पालन पोषण बड़े ही प्यार के साथ किया गया था। इसके साथ ही उनके दो बड़े भाई और भी थे जिनका नाम महादेव और सीताराम था। केशव बलिराम हेडगेवार के पिता वेद शास्त्र और भारतीय दर्शन के विद्वान थे तथा पंडिताई से परिवार का भरण पोषण करते थे।

शिक्षा
केशव बलीराम हेडगेवार की प्रारंभिक शिक्षा नागपुर के ‘नील सिटी हाई स्कूल’ से ही हुई। वे बचपन से ही क्रांतिकारी प्र्वृति के थे और अंग्रेज शासकों से घृणा करते थे। जब वे स्कूल में पढ़ते थे तो समय एक अंग्रेज इंसपेक्टर स्कूल में निरक्षण के लिए आने पर केशव राय ने अपने कुछ सहपाठियों के साथ उनका स्वागत ‘ वंदे मातरम’ जयघोष के साथ किया। जिस पर अंग्रेज अधिकारी को बहुत गुस्सा आ गया और केशव राव को स्कूल से निकालने का आदेश दे दिया। इसके बाद में उन्होंने अपनी मैट्रिक की पढ़ाई पूना के नेशनल स्कूल से पूरी की।

केशव के सबसे बड़े भाई महादेव भी शास्त्रों केअच्छे ज्ञाता तो थे इसके साथ ही वे मल्ल-युद्ध की कला में भी काफी माहिर थे। वे रोज अखाड़े में जाकर स्वयं तो व्यायाम करते ही थे गली-मुहल्ले के बच्चों को इकठ्ठे करके उन्हें भी कुश्ती के दाँव-पेंच सिखलाते थे। महादेव भारतीय संस्कृति और विचारों का बड़ी सख्ती से पालन करते थे। केशव के मानस-पटल पर बड़े भाई महादेव के विचारों का गहरा प्रभाव था। लेकिन वे बड़े भाई की अपेक्षा बाल्यकाल से ही क्रान्तिकारी विचारों के थे। जिसका परिणाम यह हुआ कि वे डॉक्टरी पढ़ने के लिये कलकत्ता गये और वहाँ से उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज से प्रथम श्रेणी में डॉक्टरी की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। लेकिन घर वालों की इच्छा के विरुद्ध देश-सेवा के लिए नौकरी का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। डॉक्टरी करते करते ही उनकी तीव्र नेतृत्व प्रतिभा को भांप कर उन्हें हिन्दू महासभा बंगाल प्रदेश का उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया।

क्रांतिकारी गतिविधियाँ
कलकत्ता में रहते हुए डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने अनुशीलन समिति और ‘युगांतर’ जैसे विद्रोही संगठनों से अंग्रेजी सरकार से निपटने के लिए विभिन्न विधाएं सीखीं। अनुशीलन समिति की सदस्यता ग्रहण करने के साथ ही वह रामप्रसाद बिस्मिल के संपर्क में आ गए। केशब चक्रवर्ती के छद्म नाम का सहारा लेकर डॉ. हेडगेवार ने काकोरी कांड में भी भागीदारी निभाई थी, जिसके बाद वह भूमिगत हो गए थे। इस संगठन में अपने अनुभव के दौरान डॉ. हेडगेवार ने यह बात जान ली थी कि स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजी सरकार से लड़ रहे भारतीय विद्रोही अपने मकसद को पाने के लिए कितने ही सुदृढ क्यों ना हों, लेकिन फिर भी भारत जैसे देश में एक सशस्त्र विद्रोह को भड़काना संभव नहीं है। इसीलिए नागपुर वापस लौटने के बाद उनका सशस्त्र आंदोलनों से मोह भंग हो गया। नागपुर लौटने के बाद डॉ. हेडगेवार समाज सेवा और तिलक के साथ कांग्रेस पार्टी से मिलकर कांग्रेस के लिए कार्य करने लगे थे। कांग्रेस में रहते हुए वह डॉ. मुंजे के और नजदीक आ गए थे, जो जल्द ही डॉ. हेडगेवार को हिंदू दर्शनशास्त्र में मार्गदर्शन देने लगे थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना
उन दिनों देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी और सभी सचेत युवा उसमें अपनी सोच और क्षमता के हिसाब से भागीदारी निभा रहे थे। हेडगेवार भी शुरुआती दिनों में कांग्रेस में शामिल हो गए। 1921 के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया और एक साल जेल में बिताया, लेकिन मिस्र के घटनाक्रम के बाद भारत में शुरू हुए धार्मिक-राजनीतिक ख़िलाफ़त आंदोलन के बाद उनका कांग्रेस से मन खिन्न हो गया। 1923 में सांप्रदायिक दंगों ने उन्हें पूरी तरह उग्र हिंदुत्व की ओर ढकेल दिया। वह हिंदू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बी. एस. मुंजे के संपर्क में शुरू से थे। मुंजे के अलावा हेडगेवार के व्यक्तित्व पर बाल गंगाधर तिलक और विनायक दामोदर सावरकर का बड़ा प्रभाव था। सावरकर ने ही हिंदुत्व को नए सिरे से परिभाषित किया था। वह मानते थे कि सिंधु नदी से पूर्व की ओर लोगों की विका़स यात्रा के दौरान सनातनी, आर्यसमाजी, बौद्ध, जैन और सिक्ख धर्म समेत जितने भी धर्मों और धार्मिक धाराओं का जन्म हुआ, वह सभी हिंदुत्व के दायरे में आते हैं। उनके मुताबिक मुसलमान, ईसाई और यहूदी इस मिट्टी की उपज नहीं है और इसलिए इस मिट्टी के प्रति उनके मन में ऐसी भावना नहीं है, जो हिंदुओं के मन में होती है।

इसी परिभाषा के आधार पर केशव बलिराम हेडगेवार ने हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना की और उस परिकल्पना को साकार करने के लिए 1925 में ‘विजयदशमी’ के दिन संघ की नींव रखी। वह संघ के पहले सर संघचालक बने। संघ की स्थापना के बाद उन्होंने उसके विस्तार की योजना बनाई और नागपुर में शाखा लगने लगी। भैय्याजी दाणी, बाबासाहेब आप्टे, बालासाहेब देवरस और मधुकर राव भागवत इसके शुरुआती सदस्य बने। इन्हें अलग-अलग प्रदेशों में प्रचारक की भूमिका सौंपी गई।

निधन
केशव बलिराम हेडगेवार की मृत्यु 21 जून, 1940 को नागपुर में हुई। उनकी समाधि रेशम बाग़, नागपुर में स्थित है, जहाँ उनका अंत्येष्टि संस्कार हुआ था।

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