Akhand Bharat : अखण्ड भारत हम भारतीयों के लिए मात्र स्वप्न नहीं है बल्कि श्रद्धा है, निष्ठा है। जिन आंखों ने मातृभूमि भारत को भूमि से अधिक माता के रूप में देखा हो, जो स्वयं को इसका पुत्र मानता हो, जो प्रात: उठकर “समुद्रवसने देवी पर्वतस्तन मंडले, विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यम् पादस्पर्शं क्षमस्वमे।” कहकर उसकी रज को माथे से नित्यप्रति लगाता हो, जिनका राष्ट्रघोष वन्देमातरम् और राष्ट्रगान हो, ऐसे असंख्य अंत:करण मातृभूमि के विभाजन की वेदना को हम भारतीय उस भूमि के पूत्र कैसे भूल सकते हैं।
अखण्ड भारत से अभिप्राय अविभाजित उस भारत से है जिसे समय-समय पर खण्डित किया गया। कभी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते तो कभी जुल्म और आक्रांताओं के हमले के कारण अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, बर्मा, थाईलैंड जैसे देश हमसे अलग हो गए।
लेकिन एक सच यह भी है कि यह सभी देश आज भी हमसे सांस्कृतिक रूप से जुड़े है। इसलिए थाईलैंड के शाही दरबार जैसे कई स्थानो पर आज भी कार्यक्रमों में हिन्दू रीति-रिवाज की झलक दिखती है।
भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ इंडोनेशिया, थाईलैंड और उलानबटार जैसे देशों में पूजनीय हैं। वहीं बोर्नियो के दयाक लोगों द्वारा पालन कहारिंगन नाम का एक स्थानीय धर्म इंडोनेशिया में हिन्दू धर्म के रूप में वर्गीकृत किया गया है। साथ ही दक्षिण पूर्व एशिया में कई प्राचीन मंदिरों में हिंदू मंदिर वास्तुकला की शैली का उपयोग मिलता है। जिसमें अंगकोरवाट भी शामिल है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है और कंबोडिया के ध्वज पर भी स्थापित है। मध्य जावा में प्रम्बानन, इंडोनेशिया में सबसे बड़ा हिंदू मंदिर, त्रिमूर्ति – शिव, विष्णु और ब्रह्मा को समर्पित है।
इसी लिए हम कह सकते है कि अखण्ड भारत का विचार उतना ही पुराना है, जितना कि सभ्यताओं का इतिहास। इसका विस्तृत वर्णन हमारे प्राचीन शास्त्रों में भी मिलता है। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में आज के राष्ट्र अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, बर्मा, तिब्बत, भूटान और बांग्लादेश कई स्वतंत्र राज्यों में विभाजित थे।
महान विचारक चाणक्य ने एक ‘अखंड भारत’ के विचार को प्रतिपादित किया , जिसका अर्थ है कि इस क्षेत्र के सभी राज्य एक ही प्राधिकरण, शासन और प्रशासन के अधीन हैं। चाणक्य की प्रेरणा सम्रात चन्द्रगुप्त मौर्य ने राजनीतिक रूप से अखंड भारत की स्थापना की। मध्य काल और मुगल आक्रमणों के काल खण्ड में कई भारतीय रियासतों ने लंबे संघर्ष के बाद अपनी शक्ति को आत्मसमर्पण कर दिया। तब भी अनेक भारतीय राजा निरंतर संघर्ण करते रहे और अखण्ड भारत का विचार अतीत का एक आदर्श बन गया। इस बीच, ब्रिटिश व्यापारियों ने भारत में पैर रखा और इतिहास की दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व अंग्रेजों ने कभी नहीं सोचा था कि इस राष्ट्र को मजहबी गलती की रेखाओं के साथ तोड़ा जा सकता है। उन्हे जैसे इस बात का आभास हुआ तो उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई। भारत को विभिन्न राज्यों में व्यावहारिक रूप से तोड़ कर अपने शासन के अधीन कर लिया। इतना ही नहीं, भविष्य में एकीकरण से बचने के लिए, ब्रिटिश ने उनके बीच मजहबी मतभेदों को सामने लाकर दूरियाँ और बढ़ा दी, जिससे वे एक दूसरे के कट्टर दुश्मन बन गए।

इस प्रकार स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारियों के एक स्वर की ऊर्जा अपने लक्ष्य से बहुत दूर चली गयी। महान प्रयासों और संघर्षों के फलस्वरूप के साथ, भारत ने 1947 में अपनी स्वतंत्रता वापस तो ले ली, लेकिन वह भारत नहीं बन पाया जिसको खोया गया था और जिसे प्राप्त करने के लिए इतना बलिदान दिया गया था।
प्राचीन काल का अखंड भारत एक बार फिर से खंडित कर दिया गया। सांस्कृतिक अखंड भारत को पुन: अस्तित्व में लाने का संकल्प प्रत्रेक भारतीय का है।